• Posted by admin on Date Nov 9, 2018
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    पुस्तक समीक्षा- भारतीय लोकनाट्य स्वांग :एक अध्ययन

    बुंदेली स्वांग

    वर्तमान समय में तकनीकी साधनों के आगमन के कारण हमसे हमारी प्राचीन एवं परंपरागत प्रदर्शनकारी कलाएं दूर होती जा रही हैं । आज मनोरंजन के जितने भी साधन मौजूद हैं उनमें से अधिकांश ही अप्रत्यक्ष और आभासी हैं , जो हमें वास्तविकता से बहुत दूर ले जा रही हैं ।

    कल्पना करें कि हम कहीं जा रहे हैं और रास्ते में हमारे सामने काली माई, हनुमान जी, शंकर, राम, रावण ,शाहजहां, कलाबाजी दिखाता जोकर आदि खड़े हो जाए तो कितना रोमांचकारी अनुभव होता है । जिसे देखने के लिए हम आनंदित होते हैं जब यह बहरूपिया गांव में जाते तो बच्चे हो हल्ला मचाते हुए उनके पीछे दौड़ते और बहरूपिया एकदम पीछे पलट कर उन बच्चों को डरा देता कुछ बच्चे गिर पड़ते कुछ हंसते तो कुछ रोने लगते और फिर उसी बहरूपिया के पीछे दौड़ने लगते कितना आनंददायक अनुभव होता था।

    यह सब , ऐसे तमाम दृश्य और इन पर आधारित लोकनाट्य कला आज विलुप्त हो गई हैं और ऐसी  ही एक लोकनाट्य कला है बुंदेली लोक नाटक स्वांग जो आज विलुप्त होने की कगार पर है।  परंतु इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के नाट्य  विभाग  के विभागअध्यक्ष डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने बुंदेलखंड की इस विलुप्त होती लोकनाट्य परंपरा पर प्रथम शोध किया और प्रथम पुस्तक प्रकाशित की “भारतीय लोकनाट्य स्वांग :एक अध्ययन( बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि में )”

    जिसे इनलक्स थिएटर अवॉर्ड 130000 का प्राप्त हुआ है । बुंदेली स्वांग जितना अद्भुत है उतनी ही इसकी प्रदर्शनकारी कला है , जिसके अब तक ना केवल साहित्यिक स्तर पर अपितु प्रायोगिक स्तर पर भी डॉ हिमांशु द्विवेदी ने अनेक प्रदर्शन किए हैं । एक समय था जब लोकनाट्य स्वाग जैसी कलाएं जनसाधारण के समीप  थी , परंतु आज यह कलाएं जनसाधारण  से दूर होती जा रही हैं आधुनिकता की जकड़ ने इन कलाओं को सभागृह  तक ही सीमित कर दिया है।

    इस प्रकार की कलाओं को सरकारी संरक्षण तो मिला है सिर्फ औपचारिक मात्र ही है जो कलाकार थोड़ा पढ़ लिख गए वह अपनी कलाओं के प्रदर्शन के लिए सरकारी योजनाओं और ग्रांटओं में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे  जबकि मूल कलाकार ग्रामीण अंचल में ही है जिन्हें मीडिया और सिनेमा के प्रभाव ने बेरोजगार बना दिया है ।

    इसमें कोई संशय नहीं कि भारतीय समाज ग्लोबल होता जा रहा है और विदेशी कला संस्कृति को आदान-प्रदान के नाम पर अपने ऊपर उड़ने की कोशिश कर रहा है वह अपनी देशज नट कला को भूलता जा रहा है कुछ कलाओं को देहाती ओं का मनोरंजन कहकर शहरों क्षेत्रों में उनको उपेक्षा की नजर से देखा जाने लगा है।

    अभिप्राय यह है कि यह चिंता का विषय है कि आखिर यह कला विलुप्त क्यों हो रही हैं इन से जुड़े कलाकारों को रोजगार कैसे प्रदान किया जाए आदि तमाम विषयों और मुद्दों पर डॉ हिमांशु द्विवेदी द्वारा लिखित पुस्तक भारतीय लोकनाट्य  स्वांग प्रश्न पैदा करती है और समाधान भी देती है….

    बुंदेलखंड में स्वांग लोकनाट्य का श्रृंगार है विंध्याचल की प्रकृतिक छटा यहां की अमर कथाएं प्रेरणादाई है यहां श्री राम कृष्ण के विष्णु रूपों मे अभिनीत लीलाओं में Swang का अक्स भी हमें देखने को मिलता है जिसमें विष्णु का मोहिनी रूप , सती का सीता का रूप ,दशानन का  साधु रूप, सुपनखा का  सुंदरी रूप, हनुमान का बटुक रूप, नारद का नारद मोह आदि इसी स्वांग के ही स्वरुप है जो लोकमानस में चित्र खींचते हैं गोस्वामी तुलसीदास का तापस वेश धारण कर श्री राम के दर्शन करना इस स्वरूप का ही उदाहरण है क्रिश्चन समाज में कृष्ण फादर का रूप ईशा के वक्र की अवधारणा है अर्थात स्वांग एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो किसी का रूप स्वरूप धारण करती  है आज हम Swang को विभिन्न श्रेणियों में बांट सकते हैं पौराणिक Swang – इंद्र के विभिन्न रूप धारण करना

    धार्मिक Swang –  नवरात्रि में आयोजित स्वांग नृत्य

    सामाजिक Swang – इसमें सामाजिक विषयों का प्रकटीकरण,सेठ साहूकार ढोंगी बाबा, पंडित वर्तमान समय में नेता अफसर आदि के क्रियाकलापों को मंच पर प्रस्तुत करना

    जातिगत स्वांग – जिनमे कहार, कुम्हार ,धोबी आदि के जातिगत Swang प्रदर्शित करना ,जिनमें राई -रावला, राई- दामोदरा आदि

    अन्य Swang – में नौटंकी, बहरूपिया,  भांड ,मिरासी , नट, बंजारा आदि रूप प्रचलित है

    चुनौतियां –  आज की फिल्मी जमाने में स्वांग का संरक्षण आवश्यक है अन्यथा इसके विलुप्त होने में देर नहीं लगेगी आज वैश्वीकरण की आंधी में बाहरी अतिक्रमण से देश का मंच रूप दूषित हो रहा है अध्यक्ष स्वांग कृति में डॉ हिमांशु द्विवेदी ने अनेक साधनों को रेखांकित किया है जिससे स्वांग लोकजीवन का स्वरूप सुंदर बना रहेगा  विलुप्त  होती लोक नाट्य परंपरा के अध्ययन के लिए यही एक उत्कृष्ट पुस्तक है!

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