• Posted by admin on Date Oct 22, 2018
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    नाट्यशास्त्र में संपूर्ण नाटक समाहित है- डॉ. हिमांशु

    Natya Shastra

    ग्वालियर

    विजयाराजे सिंधिया शासकीय कन्या महाविद्यालय मुरार (वीआरजी कॉलेज ) में नृत्य विभाग द्वारा सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में मुख्य वक्ता डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि नाटक एक ऐसी विधा है जिसमें समस्त कलाओं का समावेश होता है । नाट्यशास्त्र (natyasastra)एक प्रमाणिक ग्रंथ है जो सबसे पहले नाट्य विधा से संबंधित ज्ञान हमें प्रदान करता है। नाट्यशास्त्र मूल रूप से 11 अंगों का ही संग्रह है जिसे 36 या 37 अध्याय में यह अभिव्यक्त किया जाता है ।

    Natyasastra  के 11 अंगों में रस भाव अभिनय धर्मी वृत्ति प्रवृत्ति वाद्य, गान ,रंग मंडप ,स्वर और सिद्धि इन का वर्णन है। इन्हीं में संपूर्ण नाटक समाहित है । इनके बिना हम नाटक की कल्पना नहीं कर सकते! नाट्य के अवतरण का प्रयोजन भी धरती पर बहुत ही रोचक ढंग से हुआ । जब त्रेता युग में धरती पर काम ,क्रोध, लोभ लोगों के मन में भावनाएं बढ़ने लगी तो देवता गण ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे कहा कि आप मनोरंजन का कोई ऐसा साधन बनाइए जो सबके लिए समान रूप से लाभदायक हो। तब उन्होंने चारों वेदों का स्मरण कर ऋग्वेद से पाठ्य सामवेद से संगीत यजुर्वेद से अभिनय अथर्ववेद से रस को ग्रहण करके पंचम वेद की रचना की ।

    Natyasastra  बनाकर देवताओं को दिया परंतु देवताओं ने उसे लेने से मना कर दिया । और कहा कि यह कोई वही व्यक्ति कर सकता है जो सात्विक प्रवृत्ति का हो और जिसका कुटुंब अर्थात नाटक एक ऐसी कला है जो समूह की कला होती है जो कुटुंब के साथ की जा सकती है । भरतमुनि को नाट्यशास्त्र दिया गया और उन्होंने विद्यार्थियों को प्रदान कर इसका मंचन करवाया ।

    देवासुर संग्राम में देवताओं और असुरों की कथा दर्शाई गई जिसमें देवताओं की विजय और असुरों की पराजय बतलाई गई । जिससे असुर गण नाराज हो गए और उन्होंने नाटक प्रस्तुति में विघ्न उत्पन्न कर दिया तब विश्वकर्मा जी के द्वारा नाट्य मंडप की परिकल्पना हुई जिसमें तीन प्रकार के नाट्य मंडप आयताकार, वर्गाकार और त्रिभुजाकार रंग मंडप बनाए गए।

    इसके बाद दूसरा नाटक अमृत मंथन हुआ अमृत मंथन की प्रस्तुति को ब्रह्मा और शिव ने देखा और इसमें स्त्रियों के जोड़ने की बात कही, नाटक में स्त्रियों के प्रदर्शन के बाद इसका प्रदर्शन जब स्वर्ग में हुआ तो इस प्रदर्शन को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि धरती पर मेरे राज महल में इसका प्रदर्शन होना चाहिए तब भरत मुनि की आज्ञा से अभिनेता गण धरती पर आए और उन्होंने नाटक का प्रचार प्रसार कार्यक्रम के अंत में डॉक्टर द्विवेदी नेे भाव और रस सिद्धांत के प्रारब्ध को समझाया।

     

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