• Posted by admin on Date Oct 21, 2018
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    आजाद हिंद फौज: जानिए कैसे सुभाष चंद्र बोस बन गए नेताजी सुभाष चंद्र बोस

    azad hind fauz

    प्रथम Azad hind fauj के गठन का श्रेय कैप्टन मोहन सिंह को जाता है। द्वितिय विश्व युद्ध में सिंगापुर के पतन के बाद 40000 भारतीय सैनिकों ने अपने आपको जापान के मेजर फूजाहारा को सौंप दिया था। मेजर फूजाहारा ने इन्हें कैप्टन मोहन सिंह को सौंप दिया।

    सिंतम्बर 1941 में कैप्टन मोहन सिंह ने मलाया में azad hind fauj की स्थापना की। इन्हीं दिनों भारत के पुराने एवं प्रसिद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस जापान में थे। उन्होंने 28-30 मार्च को टोक्यो में मलाया से बर्मा तक रहने वाले सभी भारतीय नेताओं का सम्मेलन बुलाया। उसमें उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता लीग तथा azad hind fauj बनाने की घोषणा की।

    इसके बाद 14-23 जून 1942 को बैंकॉक में रासबिहारी बोस की अध्यक्षता में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें सुभाष चंद्र बोस ने भी भाग लिया। इसी सम्मेलन में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की विधिवत रूप से स्थापना हुई ।

    4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में रासबिहारी बोस ने सुभाष चंद्र बोस को azad hind fauj का सर्वोच्च सेनापति बना दिया और स्वंय केवल मुख्य परामर्शदाता बन गए। अब सुभाष नेताजी कहलाने लगे।

    21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने azad hind fauj के सेनापति की हैसियत से सिंगापुर मेंस्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की। यहीं पर उन्होंने दिल्ली चलो औऱ तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा का नारा दिया था।

    31 दिसंबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस अण्डमान पहुंचे औऱ दोनो टापुओं का प्रशासन अफने हाथों में ले लिया। अण्डमान एवं निकोबार का नाम बदलकर शहदी एवं स्वराज द्वीप कर दिया गया था।

    18 मार्च 1944 को आजाद हिंद फौज ने भारत को आजाद कराने के उद्देश्य से बर्मा की सीमाओं को पार कर उत्तर पुर्व भारत के क्षेत्र नागालैण्ड पर घेरा डाल दिया जो लगभग 1 वर्ष तक चला

    जुलाई 1944 में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द रेडियो के एक प्रसारण में गांधी जी के नाम एक विशेष प्रसारण में कहा कि भारत को स्वतत्रंता का आखिरी युद्ध शुरू हो गया है। राष्ट्रपिता भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में हम आपका आशीर्वाद औऱ कामना चाहते हैं। इसी संबोधन में सुभाषा चंद्र बोस ने सर्वप्रथम गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा था।

    22 सितंबर 1944 को सुभाष ने शहीद दिवस मनाया। आजाद हिंद फौज की सेनाएं कोहिमा पहुंच गई जहां उन्होंने तिरंगा झण्डा गाड़ दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापानी स्थिति खराब होने के कारण आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पड़ा।

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    इनपुट- एनसीईआऱटी बुक

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